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Showing posts from July, 2020

प्रभु बस तुम्हारी याद आये

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प्रभु बस तुम्हारी, तुम्हारी याद आये तुम्हारी हँसी हो, और अधर मुस्कुराये मुझे बस तुम्हारे , तुम्हारे ख्याल आये तुम्हारे ख़यालों में, मन सुकून पाए मैं बस तुम्हारे , तुम्हारे विम्ब पाऊँ  उन्ही झलकियों में सब भूल जाऊँ प्रभु बस तुम्हारी, तुम्हारी याद आये I तुम्हारी हँसी हो, और अधर मुस्कुराये II तुम्हारी हो ख़ुश्बू और जग महका जाए तुम्हारी हो ख़ुश्बू और मन बहका जाए तुम्हारी लगन में हर क्षण निकला जाए तुझमें मगन मन, तन भी हुलसा जाए तुम्हारी अदाओं में सब कुछ भूलता जाए प्रभु बस तुम्हारी, तुम्हारी याद आये I तुम्हारी हँसी हो, और अधर मुस्कुराये II   साभार  🙏 🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)

यदि कोई तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करे ..

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प्रसिद्ध दार्शनिक देकार्त  अपने विचारों और व्यवहार के कारण लोगों में अत्यंत प्रसिद्ध थे। यदि कोई उनकी आलोचना भी करता या उनसे दुर्व्यवहार करता तो वह मुस्करा कर अपने काम में लग जाते और ऐसे शांत रहते मानो कुछ हुआ ही न हो। एक बार देकार्त किसी व्यक्ति से बात कर रहे थे। अचानक बातों के दौरान उस व्यक्ति को किसी बात पर गुस्सा आ गया और उसने देकार्त को भला-बुरा कहा, लेकिन देकार्त उसके दुर्व्यवहार पर भी शांत रहे। जब उनके शिष्यों ने उस व्यक्ति को कुछ कहना चाहा तो देकार्त ने उन्हें भी शांत कर दिया। जब वह व्यक्ति वहां से चला गया तो उनके एक शिष्य ने पूछा, ' यह तो अच्छी बात नहीं है कि कोई आपके साथ बदतमीजी करे और आप चुप रहें।' उनका दूसरा शिष्य बोला, ' आपने खुद तो उसे कुछ नहीं कहा, यहां तक कि हमें भी कुछ नहीं कहने दिया। हमसे यह बर्दाश्त नहीं होता कि कोई हमारे सामने आपका अपमान करे और हम चुप रहें।' शिष्यों की बात सुनकर देकार्त मुस्कराते हुए बोले, ' क्या तुमने मेरे साथ रहकर यही सीखा है कि यदि कोई तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करे तो तुम भी उसके साथ वैसा ही करो। ऐसा करके तुम कभी भी सद्व्यवहार ...

ज्ञानी कौन है ?

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एक दिन एक धनी व्यापारी ने लाओ-त्ज़ु से पूछा – “आपका शिष्य येन कैसा व्यक्ति है?” लाओ-त्ज़ु ने उत्तर दिया – “उदारता में वह मुझसे श्रेष्ठ है।” “आपका शिष्य कुंग कैसा व्यक्ति है?” – व्यापारी ने फ़िर पूछा। लाओ-त्ज़ु ने कहा – ”मेरी वाणी में उतना सौन्दर्य नहीं है जितना उसकी वाणी में है।” व्यापारी ने फ़िर पूछा – “और आपका शिष्य चांग कैसा व्यक्ति है?” लाओ-त्ज़ु ने उत्तर दिया – “मैं उसके समान साहसी नहीं हूँ।” व्यापारी चकित हो गया, फ़िर बोला – “यदि आपके शिष्य किन्हीं गुणों में आपसे श्रेष्ठ हैं तो वे आपके शिष्य क्यों हैं? ऐसे में तो उनको आपका गुरु होना चाहिए और आपको उनका शिष्य!” लाओ-त्ज़ु ने मुस्कुराते हुए कहा – “वे सभी मेरे शिष्य इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने मुझे गुरु के रूप में स्वीकार किया है। और उन्होंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि वे यह जानते हैं कि किसी सद्गुण विशेष में श्रेष्ठ होने का अर्थ ज्ञानी होना नहीं है।” “तो फ़िर ज्ञानी कौन है?” – व्यापारी ने प्रश्न किया। लाओ-त्ज़ु ने उत्तर दिया – “वह जिसने सभी सद्गुणों में पूर्ण संतुलन स्थापित कर लिया हो।” साभार  🙏 🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)

संत की सरलता

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एक  कोतवाल  संत  दादू  से  बहुत  प्रभावित  था।  उन्हें  गुरु  बनाने  की  इच्छा  से  वह  उनकी  खोज  में  निकल  पड़ा।  थोड़ी  दूर  चलने  के  बाद  उसे  केवल  धोती  पहने  एक  साधारण  -  सा  व्यक्ति  दिखाई  पड़ा।  वह  उसके  पास  जाकर  बोला  , '  क्यों  बे  तुझे  मालूम  है  कि  संत  दादू  का  आश्रम  कहां  है  ?'  वह  व्यक्ति  कोतवाल  की  बात  अनसुनी  कर  अपना  काम  करता  रहा।  भला  कोतवाल  को  यह  सब  कैसे  सहन  होता  ?  उसने  आव  देखा  न  ताव  ,  लगा  उस  गरीब  की  धुनाई  करने।  इस  पर  भी  जब  वह  व्यक्ति  मौन  धारण  किए...

तुम विशेष हो

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सामान्य होकर सब चलते हैं  सामान्य सा जीवन सब जीते है सामान्य सा रहकर जीना क्या? जीवन के नित नए भाव में जीना क्या? उठो-उठो तुमको धरा पुकारती है उठो-उठो तुम्हे नभ पुकारता है हे युगनायक उठो अब कि तुम्हे सारा ब्रह्माण्ड पुकारता है की बरसों से इसने इंतज़ार किया है तुम्हारे पदार्पण का विकल गुहार किया है तुमको तुमसे बहुत पहले ही मांग चुके है तुम्हे सबने अपना अधिनायक स्वीकार किया है तुम विशेष हो ; अपनी विशेषता को देखो विशेषता को जानकर ; उसमें जीकर देखो तुम्हारी विशेषताएं सिर्फ तुम्हारी नहीं है ये प्रभु उपहार है , झूठी ये वाणी नहीं है तो अब साधारणता को पीछे छोड़ दो और बढ़ चलो आगे विशेष पथ पर जहां तुम्हारा एक नया व्यक्तित्व चिरकाल से तुम्हारी राह देख रहा है उसे तब भी आश थी कि तुम आओगे उसे आज भी उम्मीद है, उसे स्वीकरोगे जैसे तुम्हे किन्ही से उम्मीद होती है वैसे ही पूरे ब्रह्माण्ड को तुमसे उम्मीद होती है  अब तक बहुत हो लिया गिरना गिर कर बार-बार तुम्हारा संभलना अब इस बाल- क्रीड़ा को रहने दो और अपने शिशु स्वभाव को रहने दो सिर्फ तन से नहीं , मन से भी वयस्क हो जिसे सब दुलारते ; वह ...

“मौन” और "ध्यान"

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किसी प्रान्त का गवर्नर यात्रा के दौरान लाओत्जु के आश्रम के पास से गुजर रहा था. संत के प्रति सम्मान प्रकट करने और ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से वह उनके दर्शनों के लिए आ गया. “राज्य की देखभाल करने में मेरा लगभग पूरा समय लग जाता है और मैं दीर्घ सत्संग आदि में भाग नहीं ले सकता” – उसने लाओत्जु से कहा – “क्या आप मेरे जैसे व्यस्त आदमी के लिए एक या दो वाक्यों में धर्म का सार बता सकते हैं? “अवश्य महामहिम! मैं आपके हित के लिए इसे केवल एक ही शब्द में बता सकता हूँ”. “अद्भुत! और वह शब्द क्या है?” “मौन”. “और मौन किसकी ओर ले जाता है?” “ध्यान”. “और ध्यान क्या है?” “मौन”. साभार 🙏🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)

उत्तम व्यक्ति किसे कहते हैं ?

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बहुत पुरानी बात है। गौतम बुद्ध एक शहर में प्रवास कर रहे थे। उनके कुछ शिष्य भी उनके साथ थे । उनके शिष्य एक दिन शहर में घूमने निकले तो उस शहर के लोगों ने उन्हें बहुत बुरा भल्रा कहा - शिष्यों को बहुत बुरा ल्रगा और बे वापस लौट गये । गौतम बुद्ध ने जब देखा कि उनके सभी शिष्य बहुत क्रोध में दिख रहे हैं तो, उन्होंने पूछा - “क्या बात है आप सभी इतने तनाव में क्यूँ दिख रहे है।” तभी एक शिष्य क्रोध में बोला, “हमें यहाँ से तुरंत प्रस्थान करना चाहिये । जब हम बाहर शहर में घूमने गये तो यहाँ के लोगो ने बिना बजह हमें बहुत बुरा भला कहा ।” “जहाँ हमारा सम्मान न हो वहाँ हमें एक पल भी नहीं रहना चाहिये। यहाँ के लोग सिर्फ दुर्व्यवहार के सिवा कुछ जानते ही नहीं हैं।” गौतम बुद्ध ने मुस्कुराकर कहा - “क्‍या किसी और जगह पर तुम सदव्यवहार की अपेक्षा रखते हो ?” दूसरा शिष्य बोला - “इस शहर से तो भले लोग ही होंगे ।” तब गौतम बुद्ध बोले - “किसी जगह को सिर्फ इसलिये छोड़ देना गलत होगा कि वहाँ के लोग दुर्व्यवहार करते हैं। हम तो संत हैं। हमें तो कुछ ऐसा करना चाहिये कि जिस स्थान पर भी जायें। उस स्थान को तब तक न छोड़े जब तक अपनी अच...

सात दिन चुप रहे गौतम बुद्ध (Story)

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बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो वह सात दिन चुप रह गए। चुप्पी इतनी मधुर थी। ऐसी थी, बोलने की इच्छा ही न जागी। बोलने का भाव ही पैदा न हुआ। देवलोक थरथराने लगा। कहानी बड़ी मधुर है।  ब्रह्मा स्वयं घबरा गए।  आवाज बुद्ध को देनी ही पड़ेगी। बुद्ध को राजी करना ही पड़ेगा। जो भी मौन का मालिक हो गया। उसे बोलने के लिए मजबूर करना ही पड़ेगा। ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ बुद्ध के सामने मौजूद हुए। वे उसके चरणों में झुके। सारे संसार में ऐसा नहीं हुआ।  बुद्धत्व के चरणों में ब्रह्मा झुके और कहा- आप बोलें! आप न बोलेंगे तो महा दुर्घटना हो जाएगी। और एक बार यह सिलसिला हो गया, तो आप परंपरा बिगाड़ देंगे। बुद्ध सदा बोलते रहे हैं। उन्हें बोलना ही चाहिए। जो न बोलने की क्षमता को पा गए हैं, उनके बोलने में कुछ अंधों को मिल सकता है, अंधेरे में भटकतों को मिल सकता है। आप चुप न हों, आप बोलें। किसी तरह बमुश्किल राजी किया। कहानी का अर्थ इतना ही है कि जब मौन हो जाते हो तो अस्तित्व भी प्रार्थना करते है कि बोलो, करुणा को जगाते हैं। उन्हें रास्ते का कोई भी पता नहीं। उन्हें मार्ग का कोई भी पता नहीं है। अंधेरे में टटोलत...

नया अध्याय

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मुझे हमेशा से कहानी पढ़ना, सुनना पसंद रहा है. कहानी अगर प्रेरक हो तो मजा दुगुना हो जाता है . मैं ही क्या , ज्यादातर सभी कहानियों को पसंद किया करते है. हर कहानियाँ हमें एक अलग ही कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं, जहां हम कहानियों के किरदारों के साथ आत्मीयता स्थापित कर पाते है.  अब तक सिर्फ मैंने आप सभी से कविताओं को साझा किया. शायद अब मेरी लिखी कविताओं और कहानियों से दोनों  की आपको चाह है, मैंने ऐसा महसूस किया है . वैसे भी एक कहानी सुनाने वाले के किरदार को जीना मुझे भी पसंद है. शुरू करते हैं फिर एक नया अध्याय अपने इसी ब्लॉग पर. जहां मिलेंगी आपके दिल को छूने वाली कहानियाँ जिससे न केवल  मनोरंजन होगा बल्कि नैतिक मूल्यों की संवेदना भी मिलेंगी .  आशा है की जहाँ सुझाव की आवश्यकता होगी वहाँ आप कॉमेंट कर सुझाव जरूर भेजेंगे . मेरे इस मुहिम में आप बढ़ -चढ़ करसाथ निभाएंगे. दिल से शुक्रिया सदैव सराहना और सहयोग के लिए .उत्साह और उमंग के पंखों पर सवार होकर मैं अपने ब्लॉग को एक नया रूप देने के लिए प्रस्तुत हूँ .  साभार  श्वेता योगेश शर्...

कुछ भी नहीं है

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कई बार जैसे सब कुछ है और कुछ भी नहीं है मैं हूँ ,मेरी लेखनी हैं और कुछ भी नहीं है मन के उमड़ते भाव है  भावों का विरल प्रवाह है और कुछ भी नहीं हैं शब्द है, संरचना है विचारों की नूतन रचना है और कुछ भी नहीं हैं अभिनव रचना का प्रयास है अंतस कीअमर आश है और कुछ भी नहीं हैं जैसे सबके बीच हूँ सबका संग महसूस भी  पर साथ तो कोई नहीं है मैं जहाँ हूँ , वहाँ कौन है  एक छवि (प्रभु की) बस मुस्कुराता उसके सिवाय सोचूँ तो किसको ऐसा एक भी नहीं है आँखे जिस पर जा ठहरे  ऐसा दृश्य कोई बचा नहीं है कुछ सुनने को लालायित रहूँ  अन्तः विह्वलता में आये  ये भाव भी शेष नहीं है  नए नए भाव लिखती  एक एक भाव को पन्ने पर उड़ेलती  पर इसका उद्देश्य क्या है ? या उद्देश्य जैसा , कुछ भी नहीं है II 

रुक न तू पुरुषार्थ कर

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मृत्यु भी विराम नहीं                                     समय को आराम नहीं  फिर चक्र चलता रहता है  कोई आये या चला जाए  समय चक्र कहाँ विराम पर ? रुक न तू पुरुषार्थ कर  तू न अब आराम कर ।। चलायमान जो होता है  क़द्र उसी को मिलती है रुकने वाले को जड़ कहते हैं  चेतन को शक्ति मिलती है  अब जीत का हुंकार भर  रुक न तू पुरुषार्थ कर  तू न अब आराम कर ।। रम  गया जो दुनिया में  ये छलावा लील जाएगा  भ्रमित कर बुद्धि को ये  सारा विवेक खा जायेगा  तो स्थिति अब सुदृढ़ कर रुक न तू पुरुषार्थ कर  तू न अब आराम कर ।।  स्वस्थिति बदलने के लिए  परिस्थिति में सँभलने  के लिए  वक़्त के तू साथ चल ले  या वक़्त से भी आगे जा  की इसको न विराम कर  रुक न तू पुरुषार्थ कर  तू न अब आराम कर ।। रस है भरा विजय में  गरल होगा पराजय में  चयन ये तुम्हारा होगा  तुझे क्या पद स्वीकार है ? जीत का अंगीकार कर  रुक न तू प...

ईश्वरीय परिवार

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बहुत बहुत प्यारा है मेरा ईश्वरीय परिवार   स्नेह से सजीला है मेरा ईश्वरीय परिवार  ममता - वातसल्य और सहिष्णुता का साक्ष्य ,   दिव्य गुणों से सम्पन्न जिसका है दैवी लक्ष्य   सदा सराहनीय और सम्माननीय   मेरे लिए अनुकरणीय और आदरणीय ,  एक एक सदस्य मुझे दिल से है प्यारा    ईश्वरीय परिवार ने दिया सहयोग बहुत सारा !!  ईश्वरीय पथ पर चलना सफल बनाया   कठिनाइओं को भी सहज करना सिखाया   माया के वार से बचने का रास्ता बताया   हिम्मतवान बनाकर हमेशा आगे बढ़ाया ,  उमंग-उत्साह से खुश रहना सिखाया,  छोटी सी जीत को भी बड़ा कर जताया ,  एक एक सदस्य मुझे दिल से है प्यारा ,  ईश्वरीय परिवार ने दिया सहयोग बहुत सारा !!

तुम बिन किसको चाहूँ प्रभु

तुम बिन किसको चाहूँ प्रभु कोई इतना भाया नहीं जाऊं किधर , किस ओर प्रभु तुम बिन कोई रास आया नहीं चिंतन में हर पल अंतर (दिल ) रहे  तुम्हारे सिवा कुछ पाया नहीं तुम बिन किसको चाहूँ प्रभु कोई इतना भाया नहीं।।  तुम बिन कहाँ ठौर पाऊं प्रभु किसी ठौर ने अपनाया नहीं दस्तक भी तेरी , ठाकुर भी तू ही किसी ने ऐसे गले लगाया नहीं तुम बिन किसको चाहूँ प्रभु कोई इतना भाया नहीं।।  तुम पर ही रुकते सारे डगर अब तुमसे ही केवल मेरा वास्ता है  तुम्हारे बिना सब मंझधार जैसा  किनारों में भी राह ग़ुम हो कहीं तुम बिन किसको चाहूँ प्रभु कोई इतना भाया नहीं।। 

आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।

आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है वेला बीतती ही नहीं हैं प्रहर गुजरता नहीं है पुराणी यादों का सिलसिला लम्बा है वियोगी क्षण बीतता नहीं संयोग जल्द प्रतीत होता नहीं आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।। यादों में बैठ कर एकांत में यूं ही अकेले अकेले ही मुस्कुरा रही हूँ बावरेपन की अलग ये बयार है अकेले ही महकती जा रही हूँ यूं महकने चहकने का सिलसिला लम्बा है आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।। कौड़ियों को बीन कर जो खेल रचा था फूलों की पंखुड़ियों सा स्वपन सजा था मृदुल भावों से सब स्नेहिल हुआ था तुम्हारे उपस्थिति का मन ने स्वांग भरा था परन्तु अनुपस्थिति का निर्दय सत्य लम्बा है आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।। ऐसा नहीं की बहुत तैयारियां की है तुम्हारे लिए बहुत कुछ सजाये है केवल मन कुटिया यादों से महकाया और मेरा तन उल्लास में हुलसाया अब तो दिक् दिगन्तर चाहते है तुम आ जाओ की आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है।।