सात दिन चुप रहे गौतम बुद्ध (Story)
बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो वह सात दिन चुप रह गए। चुप्पी इतनी मधुर थी। ऐसी थी, बोलने की इच्छा ही न जागी। बोलने का भाव ही पैदा न हुआ। देवलोक थरथराने लगा। कहानी बड़ी मधुर है।
ब्रह्मा स्वयं घबरा गए। आवाज बुद्ध को देनी ही पड़ेगी। बुद्ध को राजी करना ही पड़ेगा। जो भी मौन का मालिक हो गया। उसे बोलने के लिए मजबूर करना ही पड़ेगा।
ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ बुद्ध के सामने मौजूद हुए। वे उसके चरणों में झुके। सारे संसार में ऐसा नहीं हुआ।
बुद्धत्व के चरणों में ब्रह्मा झुके और कहा- आप बोलें! आप न बोलेंगे तो महा दुर्घटना हो जाएगी। और एक बार यह सिलसिला हो गया, तो आप परंपरा बिगाड़ देंगे। बुद्ध सदा बोलते रहे हैं। उन्हें बोलना ही चाहिए। जो न बोलने की क्षमता को पा गए हैं, उनके बोलने में कुछ अंधों को मिल सकता है, अंधेरे में भटकतों को मिल सकता है। आप चुप न हों, आप बोलें।ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ बुद्ध के सामने मौजूद हुए। वे उसके चरणों में झुके। सारे संसार में ऐसा नहीं हुआ।
किसी तरह बमुश्किल राजी किया। कहानी का अर्थ इतना ही है कि जब मौन हो जाते हो तो अस्तित्व भी प्रार्थना करते है कि बोलो, करुणा को जगाते हैं। उन्हें रास्ते का कोई भी पता नहीं। उन्हें मार्ग का कोई भी पता नहीं है। अंधेरे में टटोलते हैं। उन पर करुणा करो। पीछे लौटकर देखो।

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