तुम विशेष हो

सामान्य होकर सब चलते हैं
 सामान्य सा जीवन सब जीते है
सामान्य सा रहकर जीना क्या?
जीवन के नित नए भाव में जीना क्या?

उठो-उठो तुमको धरा पुकारती है
उठो-उठो तुम्हे नभ पुकारता है
हे युगनायक उठो अब कि
तुम्हे सारा ब्रह्माण्ड पुकारता है

की बरसों से इसने इंतज़ार किया है
तुम्हारे पदार्पण का विकल गुहार किया है
तुमको तुमसे बहुत पहले ही मांग चुके है
तुम्हे सबने अपना अधिनायक स्वीकार किया है

तुम विशेष हो ; अपनी विशेषता को देखो
विशेषता को जानकर ; उसमें जीकर देखो
तुम्हारी विशेषताएं सिर्फ तुम्हारी नहीं है
ये प्रभु उपहार है , झूठी ये वाणी नहीं है

तो अब साधारणता को पीछे छोड़ दो
और बढ़ चलो आगे विशेष पथ पर
जहां तुम्हारा एक नया व्यक्तित्व
चिरकाल से तुम्हारी राह देख रहा है

उसे तब भी आश थी कि तुम आओगे
उसे आज भी उम्मीद है, उसे स्वीकरोगे
जैसे तुम्हे किन्ही से उम्मीद होती है
वैसे ही पूरे ब्रह्माण्ड को तुमसे उम्मीद होती है

 अब तक बहुत हो लिया गिरना
गिर कर बार-बार तुम्हारा संभलना
अब इस बाल- क्रीड़ा को रहने दो
और अपने शिशु स्वभाव को रहने दो

सिर्फ तन से नहीं , मन से भी वयस्क हो
जिसे सब दुलारते ; वह कैसे अन्यमनस्क हो?
कि तुम्हे तुम्हारी ही जमीर का वास्तां
अब दे दो अपनी विशेषताओं को नया रास्ता

युग-युगांतर से चल रही प्रथा जो है
तुम्हे उस पर कठुराघात करना है अब
जिस तरह जीवन चलता रहा है धरनी पर
उसके निर्णायक अंत का बनना है सबब

आज खुद को देखना तुम दर्पण में
अपने आपको देर तक निहारना ज़रूर
अब तक न जाने क्या देखते होंगे
पर अब अपनी विशेषताओं को निहारना ज़रूर

तुम्हे वो सब दृष्टिगोचर होगा सहज ही
जिसकी तुम्हे ही जाने कब से तलाश थी
तुम आ सकोगे अपने सत्य स्वरुप में
जिसकी सकल जग को अब तक आश थी

ऐसा नहीं की यह उम्मीद तुम पर भारी है !
ऐसा नहीं कोई तुम्हारा प्रतिकारी है !
बस ! अब तुम्हारी ही स्वीकार का इंतज़ार है
की स्वीकार लो ; तुम विशेष हो -बहुत विशेष हो II 

साभार 🙏🙏
श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)


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