कुछ भी नहीं है
कई बार जैसे सब कुछ है
और कुछ भी नहीं है
मैं हूँ ,मेरी लेखनी हैं
और कुछ भी नहीं है
मन के उमड़ते भाव है
भावों का विरल प्रवाह है
और कुछ भी नहीं हैं
शब्द है, संरचना है
विचारों की नूतन रचना है
और कुछ भी नहीं हैं
अभिनव रचना का प्रयास है
अंतस कीअमर आश है
और कुछ भी नहीं हैं
जैसे सबके बीच हूँ
सबका संग महसूस भी
पर साथ तो कोई नहीं है
मैं जहाँ हूँ , वहाँ कौन है
एक छवि (प्रभु की) बस मुस्कुराता
उसके सिवाय सोचूँ तो किसको
ऐसा एक भी नहीं है
आँखे जिस पर जा ठहरे
ऐसा दृश्य कोई बचा नहीं है
कुछ सुनने को लालायित रहूँ
अन्तः विह्वलता में आये
ये भाव भी शेष नहीं है
नए नए भाव लिखती
एक एक भाव को पन्ने पर उड़ेलती
पर इसका उद्देश्य क्या है ?
या उद्देश्य जैसा , कुछ भी नहीं है II

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