रुक न तू पुरुषार्थ कर

मृत्यु भी विराम नहीं                                    
समय को आराम नहीं 
फिर चक्र चलता रहता है 
कोई आये या चला जाए 
समय चक्र कहाँ विराम पर ?
रुक न तू पुरुषार्थ कर 
तू न अब आराम कर ।।

चलायमान जो होता है 
क़द्र उसी को मिलती है
रुकने वाले को जड़ कहते हैं 
चेतन को शक्ति मिलती है 
अब जीत का हुंकार भर 
रुक न तू पुरुषार्थ कर 
तू न अब आराम कर ।।

रम  गया जो दुनिया में 
ये छलावा लील जाएगा 
भ्रमित कर बुद्धि को ये 
सारा विवेक खा जायेगा 
तो स्थिति अब सुदृढ़ कर
रुक न तू पुरुषार्थ कर 
तू न अब आराम कर ।। 

स्वस्थिति बदलने के लिए 
परिस्थिति में सँभलने  के लिए 
वक़्त के तू साथ चल ले 
या वक़्त से भी आगे जा 
की इसको न विराम कर 
रुक न तू पुरुषार्थ कर 
तू न अब आराम कर ।।

रस है भरा विजय में 
गरल होगा पराजय में 
चयन ये तुम्हारा होगा 
तुझे क्या पद स्वीकार है ?
जीत का अंगीकार कर 
रुक न तू पुरुषार्थ कर 
तू न अब आराम कर ।।

तू तो जैसे मशाल है 
ज्योति बेमिशाल है 
अँधेरे का घट फोड़ दे 
परमार्थ पर अब ध्यान दे 
विजय के लिए पुरुषार्थ कर 
रुक न तू पुरुषार्थ कर 
तू न अब आराम कर ।।


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