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जीवन का दर्पण

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  एक दिन जब ऑफिस के सभी कर्मचारी ऑफिस पहुँचे, तो उन्हें दरवाजे पर एक पर्ची चिपकी हुई मिली. उस पर लिखा था – “कल उस इंसान की मौत हो गई, जो कंपनी में आपकी प्रगति में बाधक था. उसे श्रद्धांजली देने के लिए सेमिनार हाल में एक सभा आयोजित की गई है. ठीक ११ बजे श्रद्धांजली सभा में सबका उपस्थित होना अपेक्षित है.” अपने एक सहकर्मी की मौत की खबर पढ़कर पहले तो सभी दु:खी हुए. लेकिन कुछ देर बाद उन सबमें ये जिज्ञासा उत्पन्न होने लगी कि आखिर वह कौन था, जो उनकी और कंपनी की प्रगति में बाधक था? ११ बजे सेमिनार हाल में कर्मचारियों का आना प्रारंभ हो गया. धीरे-धीरे वहाँ इतनी भीड़ जमा हो गई कि उसे नियंत्रित करने के लिए सिक्यूरिटी गार्ड की व्यवस्था करनी पड़ी. लोगों का आना लगातार जारी था. जैसे-जैसे लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी,  सेमिनार हॉल में हलचल भी बढ़ती जा रही थी. सबके दिमाग में बस यही चल रहा था : “आखिर वो कौन था, जो कंपनी में मेरी प्रगति पर लगाम लगाने पर तुला हुआ था? चलो, एक तरह से ये अच्छा ही हुआ कि वो मर गया.” जैसे ही श्रद्धांजली सभा प्रारंभ हुई, एक-एक करके सभी उत्सुक और जिज्ञासु कर्मचारी कफ़न के पास जान...

समस्याओं को समय पर छोड़ दो.

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  राजस्थान के एक गाँव में रहने वाला एक व्यक्ति हमेशा किसी ना किसी समस्या से परेशान रहता था और इस कारण अपने जीवन से बहुत दु:खी था. एक दिन उसे कहीं से जानकारी प्राप्त हुई कि एक पीर बाबा अपने काफ़िले के साथ उसके गाँव में पधारे है. उसने तय किया कि वह पीर बाबा से मिलेगा और अपने जीवन की समस्याओं के समाधान का उपाय पूछेगा. शाम को वह उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ पीर बाबा रुके हुए थे. कुछ समय प्रतीक्षा करने के उपरांत उसे पीर बाबा से मिलने का अवसर प्राप्त हो गया. वह उन्हें प्रणाम कर बोला, “बाबा! मैं अपने जीवन में एक के बाद एक आ रही समस्याओं से बहुत परेशान हूँ. एक से छुटकारा मिलता नहीं कि दूसरी सामने खड़ी हो जाती है. घर की समस्या, काम की समस्या, स्वास्थ्य की समस्या और जाने कितनी ही समस्यायें. ऐसा लगता है कि मेरा पूरा जीवन समस्याओं से घिरा हुआ है. कृपा करके कुछ ऐसा उपाय बतायें कि मेरे जीवन की सारी समस्यायें खत्म हो जाये और मैं शांतिपूर्ण और ख़ुशहाल जीवन जी सकूं.” उसकी पूरी बात सुनने के बाद पीर बाबा मुस्कुराये और बोले, “बेटा! मैं तुम्हारी समस्या समझ गया हूँ. उन्हें हल करने के उपाय मैं तुम्हें कल बताऊंग...

अहम् - वहम की श्रृंखला से मुक्त प्रभु आप करो

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  यह भावों की उच्छृंखलता नयी नहीं है इसका उफान भी सर्वथा सही है भावों के ज्वार- भाटा ने भीतर तक हिलोड़ा है विवेक के क्रमिक स्पंदन ने मरोड़ा है जो निष्कर्ष है, वही अब मैं प्रस्तुत हूँ कभी कल्पना के उड़ान में उपस्थित हूँ कभी यथार्थ के ढलान में प्रस्फुटित हूँ कभी अनायास ही सब निर्मूल कर, विघटित हूँ यह भावनाओं का अनियंत्रित प्रवाह ही है जो कभी बिना सोचे समझे कुछ करती हूँ कभी उन कर्मों पर ही पुनः विचार करती हूँ || आश्चर्य ! परन्तु अपने ही व्यूह में घिरती हूँ विवेक को लाँघ कर नादानी का दम्भ भरती हूँ सत्य को पीछे छोड़कर, उसे ढूंढती हूँ अपनी अज्ञानता में यह कौन सा खेल फिर बुनती हूँ स्वयं से ही सवाल करती जाती हूँ मैं स्वयं से ही उत्तर की आशा बनाये रखती हूँ मार्ग मेरा है, पर मार्गदर्शन प्रभु आप करो मंजिल मेरी है, पर साथ वहाँ तक आप चलो भावों की अनियमितता का निवारण प्रभु आप करो इस अहम् - वहम की श्रृंखला से मुक्त प्रभु आप करो || साभार  🙏 🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)
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  जो तुम्हारे और मेरे बीच में है केवल वही प्रेम है बाकी कुछ और मुझे सिर्फ आकर्षण मात्र लगता कभी कोई अच्छा और बेहतर प्रतीत हो भी सकता है कभी कोई मुझे संवेदित कर सकता है बावज़ूद जो सत्य है प्रभु की मेरा तुमसे सम्बन्ध ही प्रेम है किसी और रिश्ते का नाम नहीं न तुम मात-पिता या सखा न तुम साजन , न तुम मेरे भगवन तुम तो केवल तुम ही प्रभु मेरे और पूर्णतया मेरे हो प्रभु मैंने देखा हमेशा से साथ निभाते जब मैं कुछ भी समझती नहीं थी जब मैं कुछ-कुछ जानने लग गयी थी तब भी देखा तुम्हे हँसते -मानते जीवन की धूप ने कई बार झुलसाया अनगढ़ विवेक ने बहुत भटकाया हर राह प्रभु तुम मुझे सँभालते रहे कभी पुचकारते तो कभी किसी रीति सँवारते रहे बहुत तारीफ बटोरी मैंने उम्र भर ईमान जानता है, सब पर हक़ तुम्हारा है तुम्हारा प्रेम मुझे तुम्हारे समीप ले आया समीप इतना की बाकी सब व्यर्थ नज़र आया | | साभार  🙏 🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)

तुमसे कहना चाहूँ बस एक बात सखी

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मैं तुमसे कहना चाहूँ बस एक बात सखी प्रभु जो मुझसे बेहद प्रेम करता है वही ईश्वर तुम्हे भी बहुत चाहता है मुझे उसका प्रेम ही चैन से एक जगह स्थिर होने नहीं देता और तुम्हे उसका प्रेम ही अन्य -अन्य कारणों से बेचैन कर जाता है मुझसे बेहतर यह कौन जानता है प्रिय सखी वह तुम्हे अब भी निहार रहा और मेरी- तुम्हारी बात सुन रहा तुम पर आशावादी बन कर तुम्हे दिल में बिठाना चाहता है तुम्हे हो अपनाना चाहता है || जिस ईश्वर को तुमने ढूँढा बहुत आज आया वो स्वयं निकट बस तुम भी एक पग बढ़ाओ अनुभव करो उसको सन्निकट उसकी पनाहों में प्रेम अपार विशवास करो मेरा सखी तुम्हारा संग सदा निभाएगा करो यकीं ज्यों मेरा बार बार निभाया है वैसे ही तुम पर भी प्रेम लुटायेगा मैं तुमसे कहना चाहूँ बस यही एक बात सखी प्रभु जो मुझसे बेहद प्रेम करता है वही ईश्वर तुम्हे भी बहुत चाहता है || तुमने उन्हें उनके स्वरुप में कभी नहीं याद किया उनको , उनके निवास पर भी नहीं तलाशा था अलग -अलग मंदिर, गिरजाघर कब मस्जिद , गुरूद्वारे में, कब वह तीर्थों में विराजा था पर तुमने बस ढूँढा उसी और तभी न मिली पहचान की कोई डोर वह दीनदयाला लेकिन सखी तुम्हारी अन्तः तड़प...

आज तेरी शिवा

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  प्यारे शिव, आज तेरी शिवा होने को जी चाहता है जो है अनुपम सौंदर्य में प्रतिष्ठित उसमें हृदयंगम होना चाहता है जिसके पास विपुल शक्तियाँ है उस पर मनस आश्रय चाहता है मेरे अंतस का भाव -भाव अब केवल तुम्हारा करावलम्ब चाहता है मीठे शिव, तुमसे जग की सृष्टि हुई है मुझ पर अपने प्रेम की वृष्टि करो क्षुद्र मन ; अपना औचित्य ढूंढें अब इस मन की भी संतुष्टि करो मुझ पर अपनी प्रिय दृष्टि करो आश्रय में रखा तुमने ? इसकी पुष्टि करो ! प्यारे शिव, आज तेरी शिवा होने को जी चाहता है........... जो अभिलक्षित या अभिशप्त है मुझे तुम्हारे संग सब स्वीकार है अनन्य पवित्रता से जो प्रचुर है उसके सामीप्य के लिए सब अंगीकार है कोमल दृष्टि का प्रभु अवलंब हो ! मुझे प्राप्त केवल तुम्हारा संग हो ! अवमानना का प्रसाद हो या गरल सा कोई प्रखर विषाद हो मुझे नाथ तुम्हारा बनने में स्वीकार सब क्या अपना कहने को तुम तैयार हो ?? प्यारे शिव, आज तेरी शिवा होने को जी चाहता है ....... साभार  🙏 🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)

सब भूल जाएँ

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चलो आज सब भूल जाएँ कुछ भी याद न रहे रहे ना याद की हम हैं रहे ना याद की तुम हो रहे न याद की जग है रहे ना याद जगवाले है चलो आज सब भूल जाएँ भूल कर सब ; आनंद उत्सव मनायें II भूल जाएँ कि मुझसे-मेरा क्या है ? क्या कुछ पुराना , क्या कुछ नया है भूल जाएँ स्मृतियों का पुलिंदा भूलने का शुरू करे एक नया धंधा भूलते है सब परेशानियों को भूलते है हर एक की नादानियों  को चलो आज सब भूल जाएँ भूल कर सब ; आनंद उत्सव मनायें II याद करना कठिन प्रतीत होता है भूलना तो सहज घटित होता है भूलना भी कार्य लगे तुम्हे अगर तो यह भी भूल जाना सरलतम उपाय है ये खुशियों का स्वतः संपन्न होता प्रक्रिया भूलने का तो  फिर क्यों न नव एहसास करें  सब कुछ भूल जाने का प्रयास करे चलो आज सब भूल जाएँ भूल कर सब ; आनंद उत्सव मनायें II  साभार  🙏 🙏 श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)