आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।

आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है
वेला बीतती ही नहीं हैं
प्रहर गुजरता नहीं है
पुराणी यादों का सिलसिला लम्बा है
वियोगी क्षण बीतता नहीं
संयोग जल्द प्रतीत होता नहीं
आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।।

यादों में बैठ कर एकांत में यूं ही
अकेले अकेले ही मुस्कुरा रही हूँ
बावरेपन की अलग ये बयार है
अकेले ही महकती जा रही हूँ
यूं महकने चहकने का सिलसिला लम्बा है
आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।।

कौड़ियों को बीन कर जो खेल रचा था
फूलों की पंखुड़ियों सा स्वपन सजा था
मृदुल भावों से सब स्नेहिल हुआ था
तुम्हारे उपस्थिति का मन ने स्वांग भरा था
परन्तु अनुपस्थिति का निर्दय सत्य लम्बा है
आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है ।।

ऐसा नहीं की बहुत तैयारियां की है
तुम्हारे लिए बहुत कुछ सजाये है
केवल मन कुटिया यादों से महकाया
और मेरा तन उल्लास में हुलसाया
अब तो दिक् दिगन्तर चाहते है तुम आ जाओ
की आज तुम्हारा इंतज़ार लम्बा है।।

Comments

  1. Ye poem Prabhu Milan ke din likha tha. Buss lag raha tha ki jaldi jaldi se Bhagwaan se aakar mei milna ho ❤

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