अहम् - वहम की श्रृंखला से मुक्त प्रभु आप करो

 यह भावों की उच्छृंखलता नयी नहीं है

इसका उफान भी सर्वथा सही है
भावों के ज्वार- भाटा ने भीतर तक हिलोड़ा है
विवेक के क्रमिक स्पंदन ने मरोड़ा है
जो निष्कर्ष है, वही अब मैं प्रस्तुत हूँ
कभी कल्पना के उड़ान में उपस्थित हूँ
कभी यथार्थ के ढलान में प्रस्फुटित हूँ
कभी अनायास ही सब निर्मूल कर, विघटित हूँ
यह भावनाओं का अनियंत्रित प्रवाह ही है
जो कभी बिना सोचे समझे कुछ करती हूँ
कभी उन कर्मों पर ही पुनः विचार करती हूँ ||


आश्चर्य ! परन्तु अपने ही व्यूह में घिरती हूँ
विवेक को लाँघ कर नादानी का दम्भ भरती हूँ
सत्य को पीछे छोड़कर, उसे ढूंढती हूँ
अपनी अज्ञानता में यह कौन सा खेल फिर बुनती हूँ
स्वयं से ही सवाल करती जाती हूँ मैं
स्वयं से ही उत्तर की आशा बनाये रखती हूँ
मार्ग मेरा है, पर मार्गदर्शन प्रभु आप करो
मंजिल मेरी है, पर साथ वहाँ तक आप चलो
भावों की अनियमितता का निवारण प्रभु आप करो
इस अहम् - वहम की श्रृंखला से मुक्त प्रभु आप करो ||

साभार 🙏🙏
श्वेता योगेश शर्मा (BK SHWETA)





Comments

Popular posts from this blog

समस्याओं को समय पर छोड़ दो.

सब भूल जाएँ

आज तेरी शिवा