अब इन्तजार है


जिसको पाना चाहा मैंने रात दिन,
उसकी झलक मिल गयी,
साथ और प्यार  उसका पाया,
मैं ख़ुशी में खिल गयी 

पर जैसे अब भी कुछ बाकी था,
जैसे कुछ और खोज बाकी थी,
अपना ही सत्य अभी जानना ,
बाकी था खुद को पहचानना, 

खोज जारी थी और रास्ता गुम था,
मेरी शोध का विषय भी ज्ञात नहीं था,
जैसे मैं टटोल रही हु कुछ अँधेरे में,
और क्या टटोलती हूँ यह भी अज्ञात है 

मुझे मेरा ही मार्गदर्शन करना है
पर कैसे ? यह मालूम नहीं ??
हर दिन प्रयास होता  है,
खुद को तलाशने का
हर बार हार जाती हूँ,
हर बार पछताती हूँ!

लगता है जैसे सब रहस्य 
मेरे ही मन के भीतर है
पर किस ग्रंथि में भला?
और मुझे कैसे दृश्य हो??

हर दिन ही तो ढूंढती हूँ ,
हर दिन प्रयास जारी है!
किस दिन है सफलता 
इसका ही अब इन्तजार है !!



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